Trump Tariff के चलते रुपये की गिरावट: डॉलर के मुकाबले ₹88 के करीब पहुंचा मूल्य
परिचय
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टेरिफ (Tariff) का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। विदेशी निवेशकों (FPI/FII) के पूंजी निकालने से रुपया डॉलर के मुकाबले ऑल टाइम लो (All Time Low) पर पहुंच गया है। हाल ही में बाजार में एक डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य ₹87.96 से ₹88.20 तक रिकॉर्ड किया गया।
क्यों गिर रहा है रुपया?
रुपया और डॉलर को एक तरह की कमोडिटी की तरह समझा जा सकता है।
- अगर रुपये की मांग बढ़ेगी तो रुपया मजबूत होगा।
- अगर डॉलर की मांग बढ़ेगी तो डॉलर मजबूत होगा और रुपया कमजोर पड़ेगा।
ट्रंप के टेरिफ लागू होने के बाद विदेशी निवेशकों ने भारत से पूंजी निकालनी शुरू कर दी है। इसका मतलब है कि वे अपने रुपये को छोड़कर डॉलर में शिफ्ट हो रहे हैं। इसी कारण रुपये की मांग कम हुई और डॉलर मजबूत हो गया।
एफपीआई और मार्केट का असर
फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) और फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FII) रोजाना अपने निवेश में बदलाव करते रहते हैं।
- भारत में अनिश्चितता बढ़ने पर वे पूंजी निकाल लेते हैं।
- इसका सीधा असर रुपये पर पड़ता है।
- परिणामस्वरूप, डॉलर महंगा और रुपया कमजोर हो जाता है।
आरबीआई की भूमिका: डर्टी फ्लोटिंग
रुपये का रखवाला रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) है।
- रुपये को पूरी तरह बाजार पर छोड़ना जोखिम भरा होता है।
- इसलिए RBI ज़रूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप करता है।
- इस प्रक्रिया को डर्टी फ्लोटिंग कहा जाता है।
- RBI डॉलर खरीदने-बेचने के जरिए रुपये की कीमत को संतुलित करने की कोशिश करता है।
मौजूदा स्थिति
- डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग ₹88 तक गिर चुका है।
- RBI स्थिति को स्थिर करने के लिए सक्रिय है।
- आने वाले हफ्तों और महीनों में इसका असर और स्पष्ट दिखाई देगा।
निष्कर्ष
ट्रंप के टेरिफ का सीधा असर विदेशी निवेश और भारतीय रुपया दोनों पर पड़ा है। डॉलर की मजबूती और रुपये की गिरावट यह संकेत देती है कि भारत को अपनी आर्थिक नीतियों में सतर्क रहना होगा।
यह केवल एक अस्थायी उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि वैश्विक राजनीति और व्यापारिक फैसले भारतीय अर्थव्यवस्था पर कितनी गहरी छाप छोड़ते हैं।