Premanand Ji Maharaj Biography in Hindi
श्री प्रेमानंद जी महाराज का जीवन त्याग, भक्ति और साधना का अद्भुत उदाहरण है। कानपुर के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे महाराज जी ने कम उम्र में ही घर त्याग कर भगवान के चरणों में जीवन समर्पित कर दिया। वाराणसी के घाटों पर कठोर तपस्या करते हुए उन्होंने अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उनकी आस्था कभी नहीं डगमगाई।
बाद में वृंदावन आकर उन्होंने अपना जीवन श्री राधा-कृष्ण की भक्ति में लगा दिया। उनकी वाणी और उपदेश लोगों के जीवन में शांति और प्रेम का संचार करते हैं। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे महाराज जी ने कठिन परिस्थितियों को भक्ति और समर्पण से पार किया और आज लाखों लोग उन्हें आदर्श मानते हैं।
प्रारंभिक जीवन और घर का त्याग
श्री हिट प्रेमानंद जी महाराज का जन्म कानपुर, उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। बचपन से ही उनके मन में गहरी वैराग्य भावना थी। जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तभी उन्हें यह अहसास हुआ कि इस संसार में सब कुछ नश्वर है — माता-पिता भी एक दिन नहीं रहेंगे। तभी उन्होंने निश्चय किया कि यदि कोई हमेशा साथ है तो वह केवल भगवान हैं। इसी विचार ने उन्हें भगवान की शरण में जाने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने घर का त्याग कर वाराणसी का रुख किया।
वाराणसी में साधना और कठिन तपस्या
वाराणसी पहुंचकर महाराज जी ने गंगा किनारे तपस्या का मार्ग चुना। उनका नियम था कि दिन में तीन बार गंगा स्नान करना, तुलसी घाट पर पीपल वृक्ष के नीचे ध्यान करना और केवल एक बार भिक्षा से प्राप्त अन्न ग्रहण करना। कई बार तो उन्हें केवल गंगाजल पीकर ही दिन बिताना पड़ता था।
सर्दियों की ठिठुरन और भोजन की कमी के बावजूद उनकी साधना जारी रही। यही नहीं, उन्होंने कभी किसी आराम की चाह नहीं रखी। गंगा के तट पर खुले आकाश के नीचे रहना और हर क्षण भगवान का ध्यान करना ही उनका जीवन बन गया।
वृंदावन की ओर आकर्षण
महाराज जी का मन हमेशा वृंदावन की ओर खिंचता रहा। वाराणसी में रहते हुए उन्हें कई संतों से प्रेरणा मिली। एक संयोग ऐसा आया जब वे रासलीला और चैतन्य लीला देखने गए। उस लीला ने उनके हृदय में गहरा प्रभाव डाला और उनका मन पूरी तरह से वृंदावन जाने को व्याकुल हो उठा।
आखिरकार एक संत की सहायता से वे वृंदावन पहुंचे। वहां के दिव्य वातावरण और राधा-कृष्ण की भक्ति में डूबकर उन्होंने अपने जीवन को और अधिक गहराई से साधना में लगा दिया।
कठिनाइयाँ और स्वास्थ्य चुनौतियाँ
महाराज जी के जीवन में संघर्ष कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने लंबे समय तक भूखे रहकर साधना की। जीवन का सबसे कठिन समय तब आया जब उन्हें Polycystic Kidney Disease जैसी गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ा। डॉक्टरों ने कहा कि उनके पास अधिक समय नहीं है।
लेकिन महाराज जी ने बीमारी को भी भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार किया। वे कहते थे कि “जब तक श्वास है, तब तक भक्ति है।” इस समर्पण ने उन्हें और अधिक दृढ़ बना दिया।
भक्ति और शिक्षा
महाराज जी की वाणी हमेशा प्रेम और भक्ति से भरी होती थी। उनका मानना था कि जीवन में असली सुख भागवत भक्ति से ही मिलता है। उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से लोगों को यही संदेश दिया कि भले ही दुनिया में technology, digital India, healthcare या education कितनी भी प्रगति कर ले, लेकिन आत्मिक शांति केवल भगवान की भक्ति से ही मिल सकती है।
आधुनिक समय के लिए प्रेरणा
आज जब दुनिया climate change, तनाव और असंतोष से जूझ रही है, तब महाराज जी का जीवन हमें सिखाता है कि समाधान बाहर नहीं बल्कि भीतर है। उनकी वाणी हमें यह संदेश देती है कि भक्ति और आस्था से जीवन की हर कठिनाई को पार किया जा सकता है।
निष्कर्ष
श्री हिट प्रेमानंद जी महाराज का जीवन त्याग, तपस्या और प्रेम का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने हमें यह सिखाया कि जीवन का असली उद्देश्य केवल भक्ति और समर्पण है। उनकी जीवनी आज भी लाखों लोगों को प्रेरणा देती है।