जगतगुरु रामभद्राचार्य के बयान से संत समाज में नाराज़गी, प्रेमानंद महाराज के समर्थन में उतरे कई संत
वृंदावन: हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में जगतगुरु रामभद्राचार्य ने संत श्री प्रेमानंद महाराज पर टिप्पणी करते हुए कहा कि – “ये वृंदावन है, ब्रज अयोध्या है, सब कुछ है।
मैं प्रेमानंद से द्वेष नहीं रखता हूँ। फिर कह रहा हूँ, मेरे बालक जैसे हैं। मैं उन्हें न तो विद्वान कह रहा हूँ, न साधक, न चमत्कारी। चमत्कार वही कहलाता है, जो शास्त्रीय चर्चा पर सहायक हो।”
रामभद्राचार्य के इस बयान को लेकर संत समाज में तीखी नाराज़गी सामने आने लगी है। कई संतों का कहना है कि इस प्रकार की टिप्पणी अनुचित है और समाज में गलत संदेश देती है।
श्रृंग्वेश्वरपुर पीठाधीश्वर जगतगुरु रामानुजाचार्य स्वामी ने भी असहमति जताते हुए कहा –
“भारतवर्ष में सनातन संस्कृति की धारा में सदैव भक्ति का भाव रहा है। प्रेमानंद जी जैसे असंख्य संत हुए हैं जिन्हें संस्कृत नहीं आती थी, वे पढ़े-लिखे भी नहीं थे, लेकिन उन्होंने अद्भुत भक्ति दिखाई।
मैं इस विचार से सहमत नहीं कि भक्ति को संस्कृत या विद्या से जोड़ा जाए। संत श्री प्रेमानंद जी महाराज कलियुग के दिव्य संत हैं, जो पाखंडवाद का विरोध करते हैं और लाखों युवाओं को बुरे कर्मों से हटाकर धर्ममार्ग पर ले आए हैं। ऐसे संत पर टिप्पणी करना बिल्कुल भी उचित नहीं है।”
अब कई संत प्रेमानंद महाराज के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं और जगतगुरु रामभद्राचार्य से माफी की मांग कर रहे हैं।
प्रेमानंद महाराज की ख्याति
संत प्रेमानंद महाराज की ख्याति विश्वभर में फैली हुई है। उनके अनुयायी मानते हैं कि उनके हृदय के कण-कण में राधारानी का वास है। उन्होंने करोड़ों भक्तों को भगवान और भक्ति के मार्ग से जोड़ा है।
संत समाज का कहना है कि –
“भक्ति का संस्कृत, भाषा, धन, वैभव या किसी विद्या से कोई लेना-देना नहीं है। वृंदावन धाम में पूरी दुनिया से भक्त आकर राधा नाम का जाप करते हैं। काशी में लोग भोलेनाथ का स्तवन करते हैं। भक्ति का मूल केवल श्रद्धा और प्रेम है।”
संत समाज की यह प्रतिक्रिया साफ करती है कि संत प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता और उनके योगदान पर सवाल उठाना समाज में गलत संदेश देता है।