रामभद्राचार्य के बयान पर बोले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, आपस में भिड़े संत


रामभद्राचार्य पर विवाद: दावे, आलोचना और सच्चाई

भारत में संत और धर्माचार्य समाज का मार्गदर्शन करने वाले माने जाते हैं। लेकिन कभी-कभी उनके बयानों और दावों को लेकर विवाद भी खड़े हो जाते हैं।

हाल ही में रामभद्राचार्य जी के कुछ वक्तव्यों और दावों ने संत समाज और आम जनता दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इस आर्टिकल में हम उन्हीं दावों और आरोपों की चर्चा करेंगे और समझने की कोशिश करेंगे कि असल सच क्या है।

1. सबकी निंदा करने का आरोप

रामभद्राचार्य जी पर आरोप है कि वे अक्सर दूसरे संतों की आलोचना करते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि पूरी पीठ के शंकराचार्य संस्कृत नहीं बोलते।

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लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या संस्कृत बोलना ही विद्वत्ता का प्रमाण है? तुलसीदास जी ने भी तो रामचरितमानस जैसी महान कृति संस्कृत में नहीं बल्कि अवधी भाषा में लिखी।

क्या इससे उनकी विद्वत्ता कम हो जाती है? संत समाज का मानना है कि केवल भाषा के आधार पर किसी की विद्वत्ता को नकारा नहीं जा सकता।

2. 1.5 लाख पन्ने कंठस्थ होने का दावा

रामभद्राचार्य जी का दूसरा बड़ा दावा यह है कि उन्हें डेढ़ लाख पन्ने कंठस्थ हैं। हालांकि इसकी कोई औपचारिक परीक्षा नहीं हुई है।

आलोचकों का कहना है कि अगर वास्तव में ऐसा है तो उन्हें उन पन्नों को सामने रखकर जनता के बीच अपनी स्मरण शक्ति को सिद्ध करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर यदि 150 पन्ने याद से सुनाए जाएं तो यह सच साबित हो सकता है और निश्चित रूप से यह विश्व स्तर पर एक अद्भुत उपलब्धि होगी।

3. 23 भाषाओं का ज्ञान

रामभद्राचार्य जी कहते हैं कि उन्हें 23 भाषाओं का ज्ञान है। लेकिन इंटरनेट और YouTube पर उनके प्रवचन केवल हिंदी में ही उपलब्ध हैं।

सवाल उठता है कि अगर वास्तव में उन्हें इतनी भाषाओं का ज्ञान है तो कम से कम उनमें से कुछ भाषाओं में प्रवचन सामने क्यों नहीं आए? आलोचकों का सुझाव है कि उन्हें अपनी भाषाई क्षमता को विद्वानों के साथ सार्वजनिक संवाद करके साबित करना चाहिए।

4. राम जन्मभूमि केस में गवाही का दावा

रामभद्राचार्य जी का तीसरा बड़ा दावा है कि अयोध्या राम जन्मभूमि मामले में उनके कारण फैसला आया। लेकिन अदालत और वकीलों के बयानों से यह स्पष्ट नहीं होता।

यहां तक कि कोर्ट ने उनके द्वारा प्रस्तुत “तुलसी शतक” नामक ग्रंथ को भी प्रमाणित नहीं माना। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि आखिर उनका दावा कितना सही है।

5. संत समाज और राजनीति का सवाल

रामभद्राचार्य जी पर यह आरोप भी है कि वे राजनीति से जुड़े नेताओं की प्रशंसा करते हैं, जबकि धर्माचार्य का कार्य केवल धार्मिक मार्गदर्शन देना होता है।

आलोचकों का कहना है कि जब गौमांस निर्यात जैसे मुद्दों पर सरकार सवालों के घेरे में हो, तब किसी धर्माचार्य का राजनेताओं को “मित्र” कहना संतों की परंपरा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

6. तुलसीदास जी की दृष्टि

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है – “सब कर निंदा जे नर करहीं, ते चमगादड़ होई अवतरहीं।” इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति बिना कारण सबकी निंदा करता है, उसका अगला जन्म चमगादड़ की योनि में होता है।

आलोचकों का कहना है कि यदि रामभद्राचार्य जी इस चौपाई को सच में समझते तो शायद इतनी निंदा नहीं करते।

निष्कर्ष

रामभद्राचार्य जी के बारे में लोगों की राय बंटी हुई है। एक ओर उनके अनुयायी उन्हें महान विद्वान मानते हैं, वहीं दूसरी ओर कई लोग उनके दावों को अप्रमाणित बताते हैं। समाज के लिए यह जरूरी है कि कोई भी दावा केवल प्रचार से नहीं, बल्कि प्रमाण और परीक्षा से सिद्ध हो।

अंततः संत समाज का असली कार्य लोगों को जोड़ना और शांति का संदेश देना है, न कि दूसरों की निंदा करना। यही परंपरा तुलसीदास और अन्य संतों ने दिखाई है।


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