जीएसटी में दो स्लैब लाने की तैयारी: राज्यों की सहमति और राजस्व घाटा बना बड़ी चुनौती


जीएसटी में दो स्लैब लाने पर चर्चा तेज, राज्यों की सहमति बनी सबसे बड़ी चुनौती

नई दिल्ली: वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को सरल बनाने की कवायद एक बार फिर तेज हो गई है। लंबे समय से चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार और राज्यों के बीच मतभेद बरकरार हैं। विचार यह है कि मौजूदा चार स्लैब की जगह केवल दो स्लैब रखे जाएं, लेकिन राजस्व घाटे की भरपाई को लेकर फार्मूला तय न होने से यह प्रक्रिया अटकी हुई है।

दिसंबर 2024 का टेस्ट केस

पिछले साल दिसंबर में जैसलमेर में हुई बैठक में बीमा पर जीएसटी घटाने का प्रस्ताव रखा गया था। उस समय एक ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (GoM) की रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसकी अध्यक्षता सम्राट चौधरी ने की थी।

रिपोर्ट में सुझाव था कि टैक्स ढांचे को दो स्लैब में लाने से व्यवस्था सरल होगी। लेकिन उस बैठक में ही केंद्र और राज्य आपस में भिड़ गए। मुद्दा था कि अगर 28% का स्लैब खत्म किया जाए और वस्तुओं को कम दरों में लाया जाए तो उससे होने वाले घाटे की भरपाई कौन करेगा।

कंपनसेशन का मसला

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जीएसटी लागू करते समय राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र ने कंपनसेशन सेस लगाया था। यह व्यवस्था 2026 तक चलनी है।

अब जब दो स्लैब वाला नया ढांचा लाने की तैयारी हो रही है तो राज्यों को फिर से आश्वस्त करना पड़ेगा कि उनका नुकसान कैसे पूरा किया जाएगा।

  • अगर 28% स्लैब खत्म होता है तो विशेषकर ऑटो सेक्टर से राजस्व पर बड़ा असर पड़ेगा।
  • 5% और 12% स्लैब को मिलाने, और 12% व 18% को समायोजित करने से भी राजस्व संरचना पूरी तरह बदल जाएगी।

राज्यों की सहमति अनिवार्य

वित्त आयोग और जीएसटी काउंसिल की कमेटी दोनों मानती हैं कि सुधार जरूरी है। लेकिन जब तक राज्यों के साथ ठोस सहमति नहीं बनती, तब तक कोई बड़ा फैसला लागू नहीं हो पाएगा। राज्यों की मांग है कि पहले स्पष्ट फाइनेंसिंग फार्मूला लाया जाए।

अन्य प्रस्ताव भी लंबित

वर्तमान में समानांतर रूप से कुछ अन्य सुझाव भी चर्चा में हैं

  1. स्वास्थ्य सेवाओं पर अलग से सेस लगाने का विचार।
  2. क्लीन एनर्जी (स्वच्छ ऊर्जा) को बढ़ावा देने के लिए टैक्स स्ट्रक्चर में बदलाव।

इन प्रस्तावों के साथ ही, यह देखना होगा कि क्या केंद्र सरकार राज्यों को दूसरा कंपनसेशन पैकेज देने को तैयार होगी।

संरचनात्मक बदलाव की जटिलता

यदि दो स्लैब व्यवस्था लागू होती है तो:

  • पूरे फिटमेंट स्ट्रक्चर में बदलाव करना पड़ेगा।
  • वस्तुओं को नई दरों में वर्गीकृत करना होगा।
  • इनपुट टैक्स क्रेडिट की गणना का तरीका भी बदल जाएगा।

यह सब प्रक्रियाएँ समय लेने वाली हैं और इन्हें लागू करने में एक निश्चित अवधि लगेगी।

निष्कर्ष

जीएसटी को दो स्लैब में लाना उपभोक्ताओं और कारोबारियों के लिए राहतकारी कदम हो सकता है, लेकिन राज्यों को राजस्व नुकसान से बचाने का ठोस समाधान ढूँढना अनिवार्य है। जब तक सहमति और फाइनेंसिंग का फार्मूला नहीं निकलता, तब तक यह बड़ा सुधार केवल चर्चा तक ही सीमित रहेगा।


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